जीवन के ज्ञान की सबक , सच्ची घटना पर आधारित कहानी

                      जीवन के ज्ञान की सबक 

 काफी समय पहले की बात है किसी गाँव में दो भाई रहते थे । बड़े भाई का नाम जय था तथा दूसरे भाई का नाम विजय था । विजय को सोना – चाँदी प्राप्त करने की बड़ी इच्छा थी । वह चाहता था कि वह भी पास के घनघोर जंगल में रहकर अपने भाग्य को आजमाए । क्योंकि उस जंगल में काफी सोने – चाँदी की खानें थीं । किन्तु उस जंगल में फलों का एक भी पेड़ नहीं था । विजय अपने बड़े भाई जय को बहुत मानता था । वह उसे भी अपने साथ जंगल में ले जाना चाहता था । जय बड़ा समझदार और संतोषी था । विजय की बात सुनकर जय ने उसे वहा जाने से रोका । पर वह न माना । तो बड़े भाई ने रास्ते में आने वाले खतरों की बात बता दी , मगर विजय फिर भी नहीं माना । बड़ा भाई सोच में डूब गया कि वह क्या करे ? वह भी छोटे भाई को बहुत चाहता था , इसलिए अन्त में उसके

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साथ चलने को तैयार हो गया । लेकिन एक शर्त रखी कि । हम अपने साथ दो चार नौकर , बैल , हल व बीज ले चलेंगे । शर्त सुनकर विजय हँसते हुए बोला – जब हमें सोना चाँदी मिल जाएगा , तब खेती तो करेंगे नहीं । फिर खेती का सामान लेकर चलने की क्या जरूरत है ? बड़े भाई ने कहा – कुछ भी हो , मेरी यही शर्त है । विजय ने कुछ सोचकर वह शर्त मान ली । वे चल पड़े । कुछ दिन चलने के बाद बीच जंगल में पहुँचे । वहाँ नदी बह रही थी । बड़ा भाई वहीं रुक गया । छोटा भाई खाने – पीने का सामान साथ लेकर सोने – चाँदी की खानों की तरफ चल दिया । कई दिन बीत गए । वह लौटकर नहीं आया । इस बीच जय ने वहीं उपजाऊ जमीन में अनाज और आलू बो दिए । बड़ी अच्छी फसल हुई । छोटी सी झोंपड़ी बनाकर वह वहीं रहने लगा । 

दो चार दूध देने वाले जानवर भी उसने पाल रखे थे । इस प्रकार खेती करते हुए वह अपने छोटे भाई के लौटने का इंतजार करने लगा । डेढ़ महीने के बाद विजय लौटा । वह सोना – चाँदी लादे हुये था, लेकिन बहुत थका और भूख से व्याकुल नजर आ रहा था । कमजोरी के कारण वह अधिक सोना – चाँदी लाद नहीं सका । जो लेकर चला था , उसमें बहुत सा सोना
चाँदी उसने रास्ते में ही फेंक दिया था । छोटे भाई के लौटने पर जय बड़ा खुश हुआ । उसने पूछा , इतने उदास क्यों लग रहे हो ? कितना सोना – चाँदी ले आए ? विजय ने अपनी दुःख भरी कहानी सुनाई । उसने कहा , मैं सोना चाँदी ले तो आया हूँ , परन्तु खाने पीने का सामान खत्म हो गया । रास्ते भर भूख से व्याकुल रहा । अब बहुत जोरों की भूख लगी है । मुझे कुछ खाने – पीने को दो । उसकी बात सुनकर जय के तेवर बदल गए । वह गौर से छोटे भाई का सोना – चाँदी देखने लगा । फिर बोला खाना मैं तभी दूंगा , जब बदले में तुम मुझे सारा सोना दे दोगे । बड़े भाई के व्यवहार पर विजय को बहुत आश्चर्य हुआ । वह उसको बड़ा नेक समझता था । अचानक हुए इस परिवर्तन का रहस्य उसकी समझ में नहीं आया । उसे लगा कि धन के लालच ने उसकी बुद्धि फेर दी है । विजय का भूख से बुरा हाल था । जीने के लिए खाना बहुत ‘ जरूरी था । कोई और उपाय न देख उसने मुट्ठीभर अनाज के लिए सारा सोना – चाँदी अपने भाई को दे दिया फिर भूख मिटाकर अपनी जान बचाई । जय भूखे भाई के गुस्से को समझ गया था । भाई की भूख शान्त होने के बाद वह बोला – मुझे तुम्हारा सोना चादी नहीं चाहिए । मैं तम्हें सबक सिखाना चाहता था ।

तुमने धन पाने के लालच में बुद्धि खो दी । सोने चाँदी के मुकाबले अन्न को तुच्छ समझा था । मेरा भी मजाक उड़ाया था । आज तुम्हें मालूम पड़ा कि सोने चाँदी का लालच कितना खराब है । इससे मनुष्य की समझदारी खत्म हो जाती है । तुम यह छोटी – सी बात न समझ सके । सोना चाँदी तुम्हारी भूख नहीं मिटा सकते । यह कहते हुए जय ने । अपने छोटे भाई को परिश्रम करने और संतोष से रहने की । सीख दी ।

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